मंदिर का इतिहास बड़ा ही गौरवशाली है सरससलिला पतित पावनी माँ सरयू के पावन तट पर अवस्थित बैष्णव पीठ का इतिहास लगभग 200 वर्षो का है जिसका निर्माण ब्रम्हलीन परमपूज्य संत बाबा रघुनाथ दास (आयुर्बेदाचार्य) के कर कमलो से हुआ था।मंदिर का प्रथम जीर्णोद्धार इनके शिष्य महंत बाबा रामजी दास (बी.ए. एम्.एस.) द्वारा हुआ।पुनः मंदिर का जीर्णोद्धार और वर्तमान स्वरूप बाबा रामजी दास ने आपार जनसहयोग से कराया।वर्तमान में पीठ के उत्तराधिकारी श्रीश दास जी को नित धार्मिक सामाजिक आयोजन करके गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ा रहे है।दरसल मंदिर अपने स्थापना काल से क्षेत्र की जनता हेतु केवल आस्था ,विस्वास व् आंतरिक ऊर्जा का ही श्रोत नही रहा बल्कि मंदिर चिकित्सा व पशु सेवा का माध्यम बना कर क्षेत्रीय लोगो का उत्तथान का मार्ग प्रशस्त करता रहा है।इस तपोस्थली की स्थापना करने वाले बाबा रामफल दास ने सबसे पहले प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी की स्थापना की।कुछ वर्ष पूर्व यहाँ आये प्रसिद्ध कथा वाचक कौशल जी महाराज जी ने भी मंदिर में स्थित हनुमान जी की परम्सत्ता को स्वीकारे।

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यह मंदिर अपने स्थापना काल से ही क्षेत्र की पीङित मानवता उद्धार के लिए आस्था विस्वाश व आंतरिक ऊर्जा का ही क्षेत्र का केंद्र  रहा चिकित्सा व पशु सेवा के माध्यम बना के क्षेत्रीय लोगो के उथान का मार्ग प्रसस्थ इस तपोस्थि की स्थापना करने वाले बाबा रामफल दास ने सबसे पहले प्रसिद्ध हनुमान गणि की स्थापना की इनके शिष्य ब्रह्मलीन संत बाबा रघुनाथ दास ने अपनी तपस्या व चिकित्सा सेवा के बल पर मंदिर को धर्मिकता साथ समाजिक के साथ सामाजिक सेवा केंद्र बना  दिया

<प्रथम महंथ
बाबा रघुनाथ दास महाराज
परमादरणीय ब्रह्मलीन संत सिरोमणी

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>मंदिर विकास में महान भूमिका निभाया मंदिर परम्परा का निर्वाहन करते हुऐ बिभिनन झझवाते वर्तमान महंथ बाबा रामजी दास तपश्या और चिकित्सा को ही मार्ग चुना और इन्होने मंदिर के धार्मिक सांस्कृतिक व सामाजिक विकास के विस्वाश का उत्तरोत्तर प्रयास किया इस जीवनं पुरातन मंदिर के पुरातन मंदिर के जीवनद्वार की महान कार्य क्षेत्रीय जनता एक धर्मप्रेमी बंदौआ धारणा का चूका है इस नवनिर्मित मंदिर व सत्संग भवन के प्रवेश अवसर

द्वितीय महंथ
परमादरणीय महंथ
बाबा रामदास महाराज

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गवान श्री राम का जन्म उत्सव हम राम नवमी के नाम से मनाते हैं। भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन हुआ था। त्रेता युग में अत्याचारी रावन के अत्याचारो से हर तरफ हाहाकार मचा हुआ था । साधू संतो का जीना मुश्किल हो गया था । अत्याचारी रावण ने अपने प्रताप से नव ग्रहों और काल को भी बंदी बना लिया था । कोई भी देव या मानव रावण का अंत नहीं कर पा रहा था । तब पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया । यानि भगवान श्री राम भगवान विष्णु के ही अवतार थे।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान राम का जन्म कर्क लगन में हुआ था। उनके लगन में उच्च का गुरु एवं स्वराशी का
चंद्रमा था । इसी कारण भगवान राम विशाल व्यक्तित्व के थे और उनका रूप अति मनहोर था। लग्न में उच्च का गुरु होने से वह मर्यादा पुरुषोतम कहलाये। चौथे घर में उच्च का शनि तथा सप्तम भाव में उच्च का मंगल था, अतः भगवान श्री राम मांगलिक थे । इसके कारण उनका वैवाहिक जीवन कष्टों से  

उत्तराधिकारी महंथ
महाराज श्रीश दास जी